झारखंड की राजधानी रांची के पावन प्रांगण में श्री शिवाला सेवा समिति के तत्वावधान में आयोजित भव्य शिव महापुराण कथा ने जहाँ एक ओर श्रद्धा और भक्ति की नई ऊंचाइयों को छुआ, वहीं दूसरी ओर आयोजन की समाप्ति के पश्चात उभर कर आई अव्यवस्थाओं ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। भक्ति के इस महाकुंभ में लाखों की संख्या में उमड़े शिव भक्तों का उत्साह तो चरम पर था, परंतु आयोजन समिति की दूरदर्शिता और प्रबंधन की कमियों ने आम जनमानस के मन में कड़वाहट भर दी है। विशेष रूप से वीआईपी पास वितरण की प्रक्रिया और सत्ता पक्ष से जुड़े रसूखदार व्यक्तियों के हस्तक्षेप ने इस धार्मिक अनुष्ठान की शुचिता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। स्थानीय लोगों और दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं में इस बात को लेकर भारी रोष व्याप्त है कि आयोजन का पूर्ण नियंत्रण भाजपा नेता के हाथों में सिमट कर रह गया था, जिन्होंने कथित तौर पर इस आध्यात्मिक समागम को व्यक्तिगत और राजनैतिक लाभ का जरिया बना दिया।

आरोप है कि हजारों की संख्या में वीआईपी पासों का वितरण उन कार्यकर्ताओं और चहेतों के बीच किया गया जो सेवा भाव से कोसों दूर थे, जबकि निष्ठावान भक्त घंटों तपती धूप और अव्यवस्था के बीच अपनी बारी की प्रतीक्षा करते रहे। यह भी गंभीर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने अपने परिजनों और करीबी मित्रों को अनुचित लाभ पहुंचाते हुए प्रवेश द्वारों पर एकाधिकार जमा लिया, जिसके कारण सामान्य श्रद्धालुओं को अपमानजनक स्थितियों और असुविधाओं का सामना करना पड़ा। जब आयोजन समिति ने पूर्व में ही प्रेस वार्ता के माध्यम से लाखों लोगों के आगमन की घोषणा कर दी थी, तो प्रशासन और समिति के बीच समन्वय का ऐसा अभाव चिंताजनक प्रतीत होता है। प्रवेश और निकास मार्गों पर मची अफरातफरी, सुरक्षा घेरों का टूटना और भीड़ नियंत्रण के विफल प्रयासों ने आयोजन की भव्यता को धूमिल कर दिया ।

श्रद्धालुओं की मानें तो पार्किंग की कोई सुदृढ़ व्यवस्था नहीं थी और पेयजल से लेकर मूलभूत सुविधाओं तक के लिए लोगों को दर-दर भटकना पड़ा। भारी भीड़ के दबाव में कई परिवार एक-दूसरे से बिछड़ गए, जिससे महिलाओं और छोटे बच्चों को अत्यंत कष्टदायक स्थिति से गुजरना पड़ा। चिकित्सा सुविधाओं का अभाव भी चर्चा का विषय बना हुआ है। इन तमाम विवादों के केंद्र में अब श्री शिवाला सेवा समिति के अध्यक्ष रितेश कुमार की चुप्पी पर भी उंगलियां उठ रही हैं। लोग यह जानना चाहते हैं कि क्या अध्यक्ष को इन तमाम विसंगतियों की पूर्व सूचना थी या फिर वे भी इस विशेष गुट के प्रभाव में कार्य कर रहे थे। यद्यपि भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था ने भक्तों को बांधे रखा और जयघोष की गूंज से वातावरण पवित्र बना रहा, किंतु आयोजन की अपारदर्शिता और वीआईपी संस्कृति के हावी होने से उपजा यह विवाद भविष्य के आयोजनों के लिए एक सबक और गहरी चिंता का विषय बन गया है।
