संघर्ष की बेड़ियों को काटकर आत्मनिर्भरता के खुले आसमान में सीमा कुमारी की ऊँची उड़ान
झारखंड के रामगढ़ जिले में स्थित दुलमी प्रखंड का छोटा सा गाँव उसरा आज एक ऐसी गौरवगाथा का साक्षी बन रहा है जो न केवल साहस की कहानी है बल्कि ग्रामीण भारत की बदलती तस्वीर का जीवंत प्रमाण भी है। यहाँ की रहने वाली सीमा कुमारी ने अपनी अटूट इच्छाशक्ति और कड़ी मेहनत के बल पर अभावों के काले बादलों को चीरकर सफलता का वह सूरज उगाया है जिसकी चमक अब पूरे क्षेत्र में फैल रही है। एक समय था जब सीमा का जीवन घोर आर्थिक तंगी और कर्ज के भारी बोझ तले दबा हुआ था और सात सदस्यों वाले बड़े परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर पहाड़ जैसी लगती थी। उनके पति सुबोध कुमार महतो खेती-बाड़ी और एक छोटी सी दुकान के माध्यम से जैसे-तैसे घर चलाने का प्रयास करते थे लेकिन छह हजार रुपये की मामूली मासिक आय में गुजर-बसर करना किसी चुनौती से कम नहीं था। विषम परिस्थितियों में अक्सर उन्हें साहूकारों के पास जाना पड़ता था जहाँ ऊँची ब्याज दरों का जाल उनके भविष्य को और भी अंधकारमय बना देता था।
परिवर्तन की पहली किरण वर्ष दो हजार सत्रह में तब दिखाई दी जब झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी के प्रयासों से गाँव में महिला सशक्तिकरण की लहर पहुँची। जून के महीने में जब ज्योति सखी मंडल का गठन हुआ तो सीमा ने अपनी किस्मत बदलने का संकल्प लेकर इस समूह की सदस्यता ग्रहण की। यहाँ से उनके सीखने और आगे बढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ जहाँ उन्होंने वित्तीय प्रबंधन और बही-खाता संचालन का गहन प्रशिक्षण प्राप्त किया। उनकी लगन और बुद्धिमत्ता को देखते हुए उन्हें समूह में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी सौंपी गई जिससे उनका आत्मविश्वास और अधिक बढ़ गया। समूह के माध्यम से कम ब्याज दर पर ऋण मिलने की सुविधा ने उनके सपनों को पंख लगा दिए और उन्होंने बैंक के सहयोग से मिली सत्तर हजार पांच सौ रुपये की पूंजी को निवेश करने का साहसिक निर्णय लिया।
सीमा ने इस पूंजी से सोनालिका बॉयलर मुर्गी पालन केंद्र की आधारशिला रखी और वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाकर उन्नत खेती की शुरुआत की। प्रारंभ में महज तीन सौ चूजों से शुरू हुआ यह सफर आज एक सफल व्यवसाय का रूप ले चुका है। वर्तमान में उनकी आय के स्रोत बहुआयामी हो चुके हैं जहाँ मुर्गी पालन से लेकर सामान्य दुकान और मौसमी खेती तक हर क्षेत्र से उन्हें अच्छा मुनाफा प्राप्त हो रहा है। आज उनकी वार्षिक आय सवा लाख रुपये के आंकड़े को पार कर चुकी है जिसने उनके परिवार को दरिद्रता के दलदल से पूरी तरह बाहर निकाल दिया है। आर्थिक रूप से सुदृढ़ होने का सबसे सुखद परिणाम उनके बच्चों की शिक्षा पर पड़ा है क्योंकि अब वे अपने बच्चों को निजी विद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाने में सक्षम हैं। सीमा कुमारी अब केवल एक घरेलू महिला नहीं बल्कि एक सफल ग्रामीण उद्यमी के रूप में जानी जाती हैं जो भविष्य में अपने व्यवसाय को और भी बड़े स्तर पर ले जाने का सपना देखती हैं। उनकी यह प्रेरणादायक यात्रा यह सिद्ध करती है कि यदि सही मार्गदर्शन और उचित अवसर मिले तो एक साधारण महिला भी समाज के लिए सफलता का अनुपम उदाहरण बन सकती है।
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