आवारा कुत्तों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की अहम सुनवाई, असामान्य संख्या में याचिकाओं पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
देशभर में आवारा कुत्तों (Stray Dogs) से जुड़े मामलों ने अब सुप्रीम कोर्ट का विशेष ध्यान खींच लिया है। इस संवेदनशील और बहुचर्चित मुद्दे पर आज शीर्ष अदालत में विस्तृत सुनवाई होने जा रही है। आवारा कुत्तों से संबंधित डॉग बाइट की घटनाएं, सार्वजनिक सुरक्षा, जनस्वास्थ्य और पशु कल्याण जैसे विषयों को लेकर दायर की गई अनेक याचिकाओं के कारण यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर बहस का केंद्र बन गया है।
पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दायर अंतरिम आवेदनों (Interlocutory Applications) की असामान्य रूप से अधिक संख्या पर हैरानी जताई थी। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि इतने अधिक आवेदन तो आमतौर पर इंसानों से जुड़े मामलों में भी देखने को नहीं मिलते। यह टिप्पणी उस समय आई थी जब वकीलों ने आवारा कुत्तों से जुड़े कई नए आवेदन अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए थे।
आज की सुनवाई तीन जजों की विशेष पीठ द्वारा की जाएगी, जिसमें न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया शामिल हैं। मामले की गंभीरता और इससे जुड़ी परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाओं को देखते हुए इसे विशेष बेंच को सौंपा गया था, ताकि सभी पहलुओं पर गहराई से विचार किया जा सके।
यह मामला वर्ष 2025 में उस समय शुरू हुआ था, जब सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में बढ़ती आवारा कुत्तों की संख्या, डॉग बाइट की घटनाओं और Animal Birth Control (ABC) नियमों के सही अनुपालन को लेकर स्वतः संज्ञान लिया था। इसके बाद विभिन्न राज्यों, सामाजिक संगठनों, पशु अधिकार समूहों और आम नागरिकों की ओर से बड़ी संख्या में याचिकाएं दायर की गईं।
मामले में दो प्रमुख दृष्टिकोण सामने आए हैं। एक पक्ष आवारा कुत्तों को शेल्टर होम्स में स्थानांतरित करने और सख्त नियंत्रण उपायों की वकालत कर रहा है, ताकि सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। वहीं दूसरी ओर पशु अधिकार संगठनों का कहना है कि समस्या का समाधान मानवीय तरीकों से ही संभव है, जैसे नसबंदी, टीकाकरण और समुदाय आधारित प्रबंधन कार्यक्रम।
आज की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट इन सभी दलीलों को सुनेगा और यह स्पष्ट करेगा कि आगे के आदेशों में क्या संशोधन किए जाएंगे। साथ ही यह भी संभावना जताई जा रही है कि अदालत राष्ट्रीय स्तर पर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर सकती है, जिससे सभी राज्यों और स्थानीय निकायों को एक समान नीति अपनाने में मदद मिले।
यह मामला केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक महत्व का भी है, क्योंकि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, नागरिकों की सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन से जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई देशभर में आवारा कुत्तों के प्रबंधन, नगर निकायों की जिम्मेदारी और नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर एक स्पष्ट दिशा तय कर सकती है।
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