यूजीसी इक्विटी विधेयक पर पूर्व विधायक सुरेंद्र नाथ सिंह का विरोध, कहा—“न औचित्यपूर्ण, न प्रासंगिक”
बैरिया के पूर्व विधायक सुरेंद्र नाथ सिंह ने यूजीसी इक्विटी विधेयक को लेकर गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे रद्द करने की मांग की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिस उद्देश्य को लेकर यह विधेयक लाया गया है, उससे दलित समाज का कोई ठोस या दूरगामी हित सधता हुआ प्रतीत नहीं होता। न ही इससे उन्हें कोई वास्तविक सुख या सुविधा मिलने की संभावना है। इसके विपरीत, इस विधेयक से सवर्ण समाज की भावनाएँ आहत हुई हैं।
सुरेंद्र नाथ सिंह ने कहा कि वे भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से आदरपूर्वक निवेदन करना चाहते हैं कि वर्तमान समय में यह कदम न तो औचित्यपूर्ण है और न ही प्रासंगिक। इसलिए इस पर गंभीरता से पुनर्विचार किया जाना आवश्यक है।
उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामाजिक योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि संघ अपने ध्येय और लक्ष्य को केंद्र में रखते हुए अपनी 100वीं वर्षगांठ पूर्ण कर रहा है। शताब्दी-दीर्घ इस साधना के दौरान संघ ने समाज में समरसता स्थापित करने, छुआछूत और भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में निरंतर और प्रभावी प्रयास किए हैं। आज की सामाजिक परिस्थितियों में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि छुआछूत और सामाजिक भेदभाव लगभग समाप्ति की अवस्था में पहुँच चुके हैं।
पूर्व विधायक ने चिंता जताई कि ऐसे समय में किसी छोटे से विधेयक के माध्यम से उन विषयों को पुनः कुरेदना, जिनसे समाज आगे बढ़ चुका है, न केवल अनावश्यक है बल्कि किसी न किसी वर्ग को पीड़ा पहुँचाने वाला भी हो सकता है। उनके अनुसार, इस विधेयक से न तो किसी पक्ष को वास्तविक लाभ मिलेगा और न ही कोई नई सुविधा; बल्कि इससे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की समरसता की भावना और उसके मूल सिद्धांतों को क्षति पहुँचने की आशंका है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि वर्तमान परिस्थितियों में यह विधेयक लागू किया जाता है, तो भय और आशंका के कारण सवर्ण समाज के लोग दलित समाज के समीप जाने से हिचकिचाएँगे। इसका सीधा और प्रतिकूल प्रभाव सामाजिक सौहार्द पर पड़ेगा और उस भावना को कमजोर करेगा, जिसे मजबूत करने के लिए संघ ने सौ वर्षों तक सतत परिश्रम किया है।
सुरेंद्र नाथ सिंह के अनुसार, जिस भेदभाव और छुआछूत को समाप्त करने के लिए लंबी साधना की गई है, उसका पुनर्जन्म किसी भी दृष्टि से उचित या प्रासंगिक नहीं कहा जा सकता। उन्होंने दोहराया कि इस विधेयक से न तो दलित समाज को कोई वास्तविक लाभ होगा और न ही कोई ठोस सुख-सुविधा, जबकि सवर्ण समाज को मानसिक पीड़ा और भावनात्मक आघात अवश्य पहुँचेगा।
अंत में उन्होंने विनम्रतापूर्वक आग्रह किया कि इस विधेयक पर गंभीरता से पुनर्विचार करते हुए इसे वापस लेने की प्रक्रिया अपनाई जाए। यही उनका व्यक्तिगत और सुविचारित मत है।
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