पेसा नियमावली पर चम्पाई सोरेन का तीखा हमला, बोले— आदिवासी स्वशासन और अस्तित्व पर सबसे बड़ा खतरा
रांची। पेसा नियमावली को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री एवं वरिष्ठ आदिवासी नेता चम्पाई सोरेन ने झारखंड सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने पेसा के नाम पर आदिवासी समाज को धोखा दिया है और जो नियमावली लाई गई है, वह पूरी तरह से आदिवासी विरोधी है। हाईकोर्ट के दबाव और विपक्ष के आंदोलन के बावजूद सरकार ने पेसा अधिनियम की मूल भावना के विपरीत नियम बनाए हैं, जो आदिवासी स्वशासन और परंपरागत व्यवस्था को कमजोर करते हैं।
चम्पाई सोरेन ने कहा कि नई नियमावली में पेसा के मूल स्वरूप को ही बदल दिया गया है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इसमें ग्राम सभा के गठन से जुड़े प्रावधानों से ‘रूढ़िजन्य विधि’ और ‘धार्मिक प्रथा’ जैसे महत्वपूर्ण शब्द हटा दिए गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ग्राम सभा के अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर “पिछला दरवाजा” खोल दिया गया है, जो पेसा कानून और संविधान की भावना के खिलाफ है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब भारतीय संविधान की धारा 13(3)(क) में रूढ़िजन्य प्रथाओं को मान्यता दी गई है, तो सरकार इन्हें हटाकर किसे लाभ पहुंचाना चाहती है। ग्राम सभा के गठन में पारंपरिक व्यवस्था को दरकिनार करने से पेसा कानून का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
चम्पाई सोरेन ने कहा कि पेसा कानून का मुख्य उद्देश्य आदिवासी समाज की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा करना है। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्टों ने भी अपने फैसलों में पेसा को आदिवासी स्वशासन और सांस्कृतिक संरक्षण का संवैधानिक विस्तार बताया है। इसके बावजूद राज्य सरकार ऐसे लोगों को अधिकार देना चाहती है, जिन्होंने आदिवासी धर्म, परंपरा और जीवनशैली को पहले ही त्याग दिया है।
उन्होंने 2013 के ओडिशा के नियमगिरि पर्वत मामले का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासियों की धार्मिक आस्था को मान्यता देते हुए खनन परियोजना को रद्द कर दिया था। जब देश की सर्वोच्च अदालत आदिवासियों की धार्मिक मान्यताओं का सम्मान कर सकती है, तो झारखंड सरकार को इससे क्या आपत्ति है?
चम्पाई सोरेन ने आरोप लगाया कि सरकार लगातार शेड्यूल एरिया में राज्यपाल और ग्राम सभा की शक्तियों को सीमित कर उपायुक्तों को अधिक अधिकार दे रही है, ताकि प्रशासन मनमर्जी से फैसले ले सके। नई नियमावली में ग्राम सभाओं के अधिकारों को काफी हद तक घटा दिया गया है। सामुदायिक संसाधनों की परिभाषा को सीमित कर जल, जंगल, जमीन और लघु खनिजों पर ग्राम सभा के अधिकार कम कर दिए गए हैं।
उन्होंने कहा कि पहले ग्राम सभा को राज्य की योजनाओं, डीएमएफटी समेत अन्य कार्यक्रमों को अनुमोदित करने का अधिकार था, लेकिन अब सिर्फ सहमति लेने की व्यवस्था की गई है। यदि 30 दिनों में सहमति नहीं दी जाती, तो उसे स्वीकृत मान लिया जाएगा। इससे ग्राम सभा की भूमिका औपचारिक बनकर रह जाएगी।
लघु खनिजों, जमीन वापसी और सीएनटी/एसपीटी कानून से जुड़े कई अधिकार भी ग्राम सभा से छीन लिए गए हैं। शेड्यूल एरिया में उद्योगों की स्थापना को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं होने पर भी उन्होंने सवाल उठाए और कहा कि विकास के नाम पर आदिवासियों और मूलवासियों को लगातार विस्थापन की कीमत चुकानी पड़ रही है।
चम्पाई सोरेन ने चांडिल डैम और टाटा समूह का उदाहरण देते हुए कहा कि बड़े उद्योग और परियोजनाएं मुनाफा कमाती हैं, जबकि विस्थापितों की हालत बद से बदतर होती चली जाती है। उन्होंने टाटा लीज के नवीनीकरण की प्रक्रिया को तत्काल रोकने की मांग की।
उन्होंने कहा कि आदिवासी विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ऐसी विकास नीति चाहिए जिसमें प्रभावित परिवारों को उनकी जमीन पर स्थापित उद्योगों के लाभ में भागीदार बनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित हो सके।
हिंडाल्को को नोवामुंडी में बिना ग्राम सभा की सहमति के जमीन दिए जाने का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने कहा कि इससे साफ होता है कि सरकार पेसा और ग्राम सभाओं के अधिकारों को कितनी गंभीरता से लेती है। नियमावली बनाते समय सरकार को शराब दुकानों और भट्ठियों की चिंता तो रही, लेकिन आदिवासियों और विस्थापितों के अधिकारों की नहीं।
अंत में चम्पाई सोरेन ने चेतावनी दी कि आदिवासियों के अधिकारों को छीनने की इस कोशिश का हर स्तर पर पुरजोर विरोध किया जाएगा।
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